क्या हमारी सब्जियाँ सुरक्षित हैं? नए अध्ययन में यमुना किनारे उगाई जाने वाली सब्जियों में खतरनाक भारी धातु प्रदूषण और कैंसर के जोखिम का खुलासा

क्या हमारी सब्जियाँ सुरक्षित हैं? नए अध्ययन में यमुना किनारे उगाई जाने वाली सब्जियों में खतरनाक भारी धातु प्रदूषण और कैंसर के जोखिम का खुलासा


नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026।

Elsevier Publications की प्रतिष्ठित पत्रिका Energy Nexus में प्रकाशित एक नए व्यापक अध्ययन में नई दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित कृषि क्षेत्रों की मिट्टी और वहाँ उगाई जाने वाली सब्जियों में भारी धातुओं के गंभीर स्तर पर प्रदूषण का खुलासा हुआ है। अध्ययन में बिना उपचार किए गए अपशिष्ट जल से सिंचाई के कारण स्थानीय स्तर पर उत्पादित सब्जियों के सेवन से गैर-कैंसरकारी (non-carcinogenic) तथा कैंसरकारी (carcinogenic) स्वास्थ्य जोखिम सामने आए हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय हैं।

             


अध्ययन के अनुसार, यद्यपि दिल्ली का क्षेत्र यमुना नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का केवल लगभग 1 प्रतिशत है, लेकिन राजधानी से नदी में जाने वाला प्रदूषण उसके कुल प्रदूषण भार का लगभग 70–80 प्रतिशत बताया गया है। दिल्ली के आसपास के पेरी-अर्बन क्षेत्रों में अनेक किसान सिंचाई के लिए प्रदूषित यमुना जल पर निर्भर हैं। इसके परिणामस्वरूप मोलिब्डेनम, एल्युमिनियम, जिंक, निकेल, क्रोमियम, कैडमियम और सीसा जैसी खतरनाक भारी धातुएँ कृषि मिट्टी और खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रही हैं।

                


अध्ययन में यमुना नदी के केवल एक सीमित हिस्से को शामिल किया गया है। उल्लेखनीय है कि यमुना लगभग 1,379 किलोमीटर लंबी नदी है, जो सात राज्यों से होकर गुजरती है।

विभिन्न सब्जियों में भारी धातुओं का खतरनाक संचय 

प्रो. दिनबंधु साहू, वरिष्ठ प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान विभाग के नेतृत्व में शोध दल ने दैनिक आहार में शामिल की जाने वाली विभिन्न सामान्य सब्जियों का परीक्षण किया। अध्ययन में पाया गया कि पौधों की जड़ें विभिन्न फसलों में भारी धातुओं को अलग-अलग मात्रा में अवशोषित करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप सब्जियों में इन धातुओं का अत्यधिक जैव-संचयन (bioaccumulation) देखा गया।


अध्ययन के प्रमुख निष्कर्षों में सामने आया कि:

* निकेल का स्तर प्याज में निर्धारित सीमा से 65 गुना और पालक में 97 गुना अधिक पाया गया।

* क्रोमियम का स्तर सफेद मूली में 11 गुना, पालक में 12 गुना और सरसों में 22 गुना अधिक पाया गया।

* लाल मूली में मोलिब्डेनम का स्तर 340.06 mg/kg तक और क्रोमियम का स्तर 36.58 mg/kg तक पाया गया।

* मेथी में जिंक का स्तर 177.72 mg/kg तक दर्ज किया गया।

* धनिया में निकेल (19.91 mg/kg) और कैडमियम (1.59 mg/kg) का उल्लेखनीय संचय पाया गया।

* सरसों में सीसे (Lead) का स्तर 5.86 mg/kg तक पाया गया।

कैंसर और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर गंभीर चिंता 

अध्ययन के दौरान किए गए स्वास्थ्य जोखिम आकलन में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं। Hazard Index (HI), जो गैर-कैंसरकारी स्वास्थ्य जोखिमों के संयुक्त प्रभाव का आकलन करता है, सुरक्षित सीमा से काफी अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, लगभग सभी परीक्षण की गई सब्जियों में मोलिब्डेनम के आहार के माध्यम से अत्यधिक सेवन ने इस जोखिम में प्रमुख योगदान दिया।

अध्ययन में सब्जियों के सेवन से जुड़े अस्वीकार्य कैंसरकारी जोखिम भी सामने आए, जिनमें मुख्य रूप से निकेल और क्रोमियम का योगदान पाया गया। Total Carcinogenic Risk (TCR) का स्तर लाल मूली में 0.17, धनिया में 0.16, तथा पालक और सफेद मूली में 0.14-0.14 दर्ज किया गया।


प्रो. साहू ने कहा कि अध्ययन में पाए गए भारी धातुओं के स्तर Food and Agriculture Organization (FAO) द्वारा निर्धारित अनुमेय सीमाओं से कई गुना अधिक हैं।


तत्काल जोखिम को कम करने के लिए शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि ज्ञात प्रदूषण-प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को ऐसी फसलों की खेती की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जिनमें भारी धातुओं के संचय की प्रवृत्ति कम हो।

             


निरंतर निगरानी और प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण की आवश्यकता


अध्ययन में कहा गया है कि क्षेत्र में दीर्घकालिक कृषि स्थिरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए तत्काल और समन्वित हस्तक्षेप आवश्यक है। मिट्टी और कृषि उत्पादों की निरंतर सरकारी निगरानी तथा नदी में प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।


प्रो. साहू ने कहा, “प्रदूषण-प्रभावित क्षेत्रों में मिट्टी और फसलों की निरंतर सरकारी निगरानी तथा नदी के स्रोत पर प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का कड़ाई से अनुपालन समय की आवश्यकता है।” इस शोध का नेतृत्व प्रो. दिनबंधु साहू ने किया, जबकि धर्मेंद्र कुमार, संजुक्ता साहू और शिवांकर अग्रवाल ने उनके साथ मिलकर अध्ययन में योगदान दिया। शोध दल ने वनस्पति विज्ञान, पर्यावरण अभियांत्रिकी और माइक्रोबायोम अनुसंधान जैसे विभिन्न क्षेत्रों की विशेषज्ञता को एक साथ लाते हुए इस बहुआयामी अध्ययन को पूरा किया।


शोध दल की इस कठोर एवं व्यापक जांच की सराहना की जाती है, जिसने यमुना प्रदूषण के कृषि मिट्टी, सब्जियों और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिए बहुविषयक दृष्टिकोण अपनाया है। यह अध्ययन साक्ष्य-आधारित पर्यावरणीय निगरानी, सुरक्षित कृषि पद्धतियों और प्रभावी अपशिष्ट जल प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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